दर्द-ए-दिल

दर्द-ए-दिल
 


आ समन्दर के किनारे पथिक प्यासा रह गया,
था गरल से जल भरा होकर रुआंसा रह गया।
 था सफर बाकि बहुत मजिल अभी भी दूर थी,
हो गया बढना कठिन घिर कर कुहासा रह गया।

लग रहे नारे हजारो छप रही रोज लाखो खबर,
गौर से जब देखा तो बन तमाशा रह गया।
दर्द-ए-दिल

एक बुत गढ ने लगी अनजान में ही मगर,
हादसा ऐसा हुआ की वह बिन तराशा रह गया।

छोड़ कर आशा किसी का चल पड़ा बेचारा राज,

आज वादा लोगो का बस दिलासा रह गया।
 
दर्द-ए-दिल

दूर से देखा तो बडे ही सुहाने मन्जर थे !
पास पहुचे तो सारे खेत ब॑जर थे !!

हम उनके पास से भी प्यासे लॊटे !
जिनकी आ॑खो मे, प्यार के समन्दर थे !!

मासूम चेहरो मे जब भी झा॑क कर देखा !
कितने ही शैतान उनके अन्दर थे !!
दर्द-ए-दिल

खुशी-खुशी उनके पहलू मे जा बैठे !
जिनके हाथो मे खूनी ख॑जर थे !!

वक्त की मार से बच सका है कॊन !

मिल गये धूल मे, कल तक जो सिकन्दर थे !!

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है



अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है

ये वक्त जो तेरा है, ये वक्त जो मेरा
हर गाम पर पहरा है, फिर भी इसे खोना है

आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आंगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है

जनता का हक़ मिले कहाँ से, चारों ओर ‪दलाली है |
‪चमड़े का दरवाज़ा है और ‪कुत्तों की रखवाली है ||

‪मंत्री, नेता, अफसर, मुंसिफ़ सब जनता के सेवक हैं |
ये जुमला भी प्रजातंत्र के मुख पर ‪भद्दी गाली है ||

उसके हाथों की ‪कठपुतली हैं सत्ता के ‪शीर्षपुरुष |
कौन कहे संसद में बैठा ‪गुंडा और मवाली है ||

सत्ता ‪बेलगाम है जनता ‪गूँगी बहरी लगती है |
कोई उज़्र न करने वाला कोई नहीं ‪सवाली है ||

सच को यूँ ‪मजबूर किया है देखो झूठ बयानी पर |
‪माला फूल गले में लटके पीछे सटी ‪दोनाली है ||

‪दौलत शोहरत बँगला गाड़ी के पीछे सब भाग रहे हैं |
‪फसल जिस्म की हरी भरी है ‪ज़हनी रक़बा खाली है ||

‪सच्चाई का जुनूँ उतरते ही हम ‪मालामाल हुए |
हर सूँ यही हवा है ‪रिश्वत हर ताली ताली है ||

वो ‪सावन के अंधे हैं उनसे मत पूँछो रुत का हाल |
उनकी खातिर हवा ‪रसीली चारों सूँ ‪हरियाली है ||

‪पंचशील के नियमो में हम खोज रहे हैं सुख साधन |
चारों ओर ‪महाभारत है दाँव चढ़ी ‪पञ्चाली है ||

पहले भी ‪मुगलों-अंग्रेजो ने जनता का ‪खून पिया |

आज 'विप्लवी' भेष बदलकर नाच रही खुशहाली है ||

झूठ सच्चाई का हिस्सा हो गया
इक तरह से ये भी अच्छा हो गया

उस ने इक जादू भरी तक़रीर की
क़ौम का नुक़सान पूरा हो गया

शहर में दो-चार कम्बल बाँट कर
वो समझता है मसीहा हो गया

ये तेरी आवाज़ नम क्यूँ हो गई
ग़म-ज़दा मैं था तुझे क्या हो गया

बे-वफाई आ गई चौपाल तक
गाँव लेकिन शहर जैसा हो गया

सच बहुत सजता था मेरी ज़ात पर

आज ये कपड़ा भी छोटा हो गया|


ताकत पे सियासत की ना गुमान कीजिये, 
इन्सान हैं इन्सान को इन्सान समझिये। 

यूँ पेश आते हो मनो नफरत हो प्यार में, 
मीठे बोल न निकले क्यूँ जुबां की कटार से। 

खुद जख्मी हो गये हो अपने ही कटार से, 
सच न छुपा पाओगे अपने इंकार से। 

आँखें भुला के दिल के आईने में झाकिये, 
इन्सान हो इन्सान को इन्सान ही समझिये। 

कैसी ख़ुशी है आप को ऐसे आतंक से ?
कैसा सकुन बहते हुए खून के रंग से ?

तलवारों खंजरों में क्यूँ किया सिंगार है, 
आप भी दुश्मन हैं आपके इस जंग में। 

खुद से न सही अपने आप से डरिये, 
इन्सान हो इन्सान को इन्सान समझिये। 

खुद का शुक्र है आप भी इन्सान हैं, 
इंसानियत से न जाने क्यूँ अनजान हैं। 

शुक्र कीजिये की खुदा मेहरबान है, 
वरना आप कौन ? क्या पहचान है। 

सच यही है, अब तो ये जान लीजिये, 

इन्सान हो इन्सान को इन्सान समझिये।

अजब हैं लोग थोड़ी सी परेशानी से डरते हैं
कभी सूखे से डरते हैं, कभी पानी से डरते हैं

तब उल्टी बात का मतलब समझने वाले होते थे
समय बदला, कबीर अब अपनी ही बानी डरते हैं

पुराने वक़्त में सुलतान ख़ुद हैरान करते थे
नये सुलतान हम लोगों की हैरानी से डरते हैं

हमारे दौर में शैतान हम से हार जाता था
मगर इस दौर के बच्चे तो शैतानी से डरते हैं

तमंचा ,अपहरण, बदनामियाँ, मौसम, ख़बर, कालिख़
बहादुर लोग भी अब कितनी आसानी से डरते हैं

न जाने कब से जन्नत के मज़े बतला रहा हूँ मैं

मगर कम-अक़्ल बकरे हैं कि कुर्बानी से डरते हैं

कहाँ चला गया बचपन का वो समाँ यारो! 
कि जब ज़मीन पे जन्नत का था गुमाँ यारो! 

बहार-ए-रफ़्ता को अब ढूँढें कहाँ यारो! 
कि अब निगाहों में यादों की है ख़िज़ाँ यारो! 

समंदरों की तहों से निकल के जलपरियाँ 
कहाँ सुनाती है अब हमको लोरियाँ यारो! 

बुझा-बुझा -सा है अब चाँद आरज़ूओं का 
है माँद-माँद मुरादों की कहकशाँ यारो! 

उफ़क़ पे डूबते सूरज के खूँ की लाली है 
ठहर गये हैं ख़लाओं के क़ारवाँ यारो! 

भटक गये थे जो ख़ुदग़र्ज़ियों के सहरा में 
हवस ने उनको बनाया है नीम जाँ यारो! 

ग़मों के घाट उतारी गई हैं जो ख़ुशियाँ 
फ़ज़ा में उनकी चिताओं का है धुआँ यारो! 

तड़प के तोड़ गया दम हिजाब का पंछी 
झुकी है इस तरह इख़लाक़ की कमाँ यारो! 

ख़ुलूस बिकता है ईमान-ओ-सिदक़ बिकते हैं 
बड़ी अजीब है दुनिया की ये दुकाँ यारो ! 

ये ज़िन्दगी तो बहार-ओ-ख़िज़ाँ का संगम है 
ख़ुशी ही दायमी ,ग़म ही न जाविदाँ यारो ! 

क़रार अहल-ए-चमन को नसीब हो कैसे 
कि हमज़बान हैं सैयाद-ओ-बाग़बाँ यारो! 

हमारा दिल है किसी लाला ज़ार का बुलबुल 
कभी मलूल कभी है ये शादमाँ यारो ! 

क़दम-क़दम पे यहाँ अस्मतों के मक़तल हैं 
डगर-डगर पे वफ़ाओं के इम्तहाँ यारो! 

बिरह की रात सितारे तो सो गये थे मगर 

सहर को फूट के रोया था आसमाँ यारो!


दिल का दर्द ज़बाँ पे लाना मुश्किल है
अपनों पे इल्ज़ाम लगाना मुश्किल है

बार-बार जो ठोकर खाकर हँसता है
उस पागल को अब समझाना मुश्किल है

दुनिया से तो झूठ बोल कर बच जाएँ,
लेकिन ख़ुद से ख़ुद को बचाना मुश्किल है।

पत्थर चाहे ताज़महल की सूरत हो,
पत्थर से तो सर टकराना मुश्किल है।

जिन अपनों का दुश्मन से समझौता है,
उन अपनों से घर को बचाना मुश्किल है।

जिसने अपनी रूह का सौदा कर डाला,

सिर उसका राज  उठाना मुश्किल है।


अब गए वक़्त क़े हर ग़म को भुलाया जाए
प्यार ही प्यार को परवान चढ़ाया जाए

आग नफ़रत की चमन को ही जला दे न कहीं
पहले इस आग को मिल-जुल के बुझाया जाए

सरहदें हैं कोई क़िस्मत की लकीरें तो नहीं
अब इन्हें तोड़ के बिछड़ों को मिलाया जाए

आतशी झील में खिल जाएँ मुहब्बत के कँवल
अब कोई ऐसा ही माहौल बनाया जाए

सिर्फ़ ज़ुल्मों की शिकायत ही करोगे कब तक
पहले मज़लूम की असमत को बचाया जाए

साज़िशें फिरती हैं कितने मुखौटे पहने

उनकी चालों से सदा ख़ुद को बचाया जाए


खफा-ए -जिन्दगी को भुला कर के तो देखिए ,
ख्वाबो की दुनियाँ से निकल कर के तो देखिए ।

तेरी यादों के ही सहारे जी रहें हैं अब तलक,

दिल के झरोंखे में कोई दीप जला कर के देखिए। 

हम समझ न पाए अब तक आपकी रुसवाई को,

नस्तरे दिल से अपना इल्जाम हटा के तो देखिए।

दस्ताने-ए-दिल को मेरी जुबां से सुना ही नही,

तिलिस्मे बेहिसी को कभी तोड़ के तो देखिए।

दर्दे-दिल को सहते हुए कितने सदियाँ गुजर गयी,

अपने माजी के मजार पर कभी आ कर के देखिए।

लगता अब उतर जायेंगे लहद में अहबाब के कांधों से,

रब के दर पर मेरे गुनाहों की सजा सुना कर तो देखिये।

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ । 
वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ । 

जिसे ले गई अभी हवा, वे वरक़ था दिल की किताब का, 
कहीँ आँसुओं से मिटा हुआ, कहीं, आँसुओं से लिखा हुआ । 

कई मील रेत को काटकर, कोई मौज फूल खिला गई, 
कोई पेड़ प्यास से मर रहा है, नदी के पास खड़ा हुआ । 

मुझे हादिसों ने सजा-सजा के बहुत हसीन बना दिया, 
मिरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो मेंहदियों से रचा हुआ । 

वही शहर है वही रास्ते, वही घर है और वही लान भी, 
मगर इस दरीचे से पूछना, वो दरख़्त अनार का क्या हुआ । 

वही ख़त के जिसपे जगह-जगह, दो महकते होटों के चाँद थे, 

किसी भूले बिसरे से ताक़ पर तहे-गर्द होगा दबा हुआ ।




ये ठीक है कि तेरी गली में न आयें हम.
लेकिन ये क्या कि शहर तेरा छोड़ जाएँ हम.

मुद्दत हुई है कूए बुताँ की तरफ़ गए,
आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएँ हम.

शायद बकैदे-जीस्त ये साअत न आ सके
तुम दास्ताने-शौक़ सुनो और सुनाएँ हम.

उसके बगैर आज बहोत जी उदास है,
'जालिब' चलो कहीं से उसे ढूँढ लायें हम.

सिखा देती है चलना ठोकरें भी राहगीरों को
कोई रास्ता सदा दुशवार हो ऐसा नहीं होता

कहीं तो कोई होगा जिसको अपनी भी ज़रूरत हो
हरेक बाज़ी में दिल की हार हो ऐसा नहीं होता

जो हो इक बार, वह हर बार हो ऐसा नहीं होता
हमेशा एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता

हरेक कश्ती का अपना तज्रिबा होता है दरिया में
सफर में रोज़ ही मंझदार हो ऐसा नहीं होता

कहानी में तो किरदारों को जो चाहे बना दीजे

हक़ीक़त भी कहानी कार हो ऐसा नहीं होता...


About the author

Admin
Donec non enim in turpis pulvinar facilisis. Ut felis. Praesent dapibus, neque id cursus faucibus. Aenean fermentum, eget tincidunt.

0 comments:

Copyright © 2013 editing Video & image Free Download and Blogger Themes.